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रेडियो सक्रियता (Radio Activity)

प्रकृति में पाए जाने वाले वे तत्व जो स्वतः विखंडित होकर अदृश्य किरणों का उतसर्जन करते रहते हैं, रेडियो सक्रिय तत्व कहलाते हैं। यह घटना रेडियो सक्रियता कहलाती है।

 

  • रेडियो सक्रियता की खोज फ्रेंच वैज्ञानिक हेनरी बेकरल, पी क्यूरी और मैडम क्यूरी ने किया था।

  • इसके लिए इन्हें सम्मिलित रूप से नोबेल पुरष्कार से सम्मानित किया गया था। 

  • 1902 में रदरफोर्ड ने प्रयोग द्वारा पाया कि रेडियो सक्रिय तत्व से उतसर्जित किरणें तीन भागों में बंट जाती है, जिसे उन्होंने अल्फ़ा (α), बीटा (β) और गामा (γ) नाम दिया था।

  • सभी प्राकृतिक रेडियो सक्रिय तत्व इन किरणों के उतसर्जन के बाद अंततः सिमा में बदल जाते हैं।

  • इन तत्वों से 1 α किरणों के उतसर्जन से परमाणु भार में चार तथा  परमाणु संख्या में दो की कमी हो जाती है।  

  • इस प्रकार 1 β किरणों के उतसर्जन से परमाणु संख्या में एक की वृद्धि होती है परन्तु परमाणु भार में कोई कमी नहीं होती है।

  • α और β के कारण परमाणु संख्या और परमाणु भार पर पड़ने वाले प्रभाव को वर्ग विस्थापन नियम या सोडी फजन नियम कहा जाता है।

  • रेडियो सक्रियता की माप "जी. एम. काउंटर" से की जाती है। 

 

अभ्र्कोष्ठ :-

इसका उपयोग रेडियो सक्रिय कणों की उपस्तिथि का पता लगाने, उनकी ऊर्जा मापने आदि के लिए किया जाता है। इसका आविष्कार सी. आर. टी. विल्सन ने किया था। 
 

अर्द्धायु काल :-

जितने समय में किसी रेडियो सक्रीय तत्व की परमाणुओं की संख्या आधी हो जाती है उसके समय को अर्द्धायु काल कहा जाता है। 
 

जब रेडियो सक्रीय समस्थानिक   C    का उपयोग कार्बन युक्त वस्तुओं की उम्र ज्ञात करने में किया जता है तब इस विधि को कार्बन डींग पद्धति कहते हैं।  

इससे मृत पेड़ - पौधे और जानवरों की आयु ज्ञात की जाती है। 
अल्फ़ा (α) किरणों की आयनन क्षमता और गामा (γ) करणों की भेदन क्षमता सबसे अधिक होती है। 

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अल्फा, बीटा और गामा किरणों के गुण

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