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ऊष्मा (Heat)

 ऊष्मा (Heat)

 

  • यह एक ऊर्जा है जो एक वस्तु से दूसरी वस्तु में तापांतर से स्थानांतरित होती है। 

  • वस्तु की ऊष्मा उसके द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करती है।

  • सामान्यतः ऊष्मा का SI मात्रक जूल होता है। 

इसके अलावा ऊष्मा के लिए निम्न मात्रकों का भी प्रयोग होता है:- 

  1. कैलोरी:- एक ग्राम जल का ताप 1 डिग्री बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को कैलोरी कहते हैं।

  2. अंतरराष्ट्रीय कैलोरी: - 1 ग्राम शुद्ध जल का ताप 14.5 डिग्री सेल्सियस से 15.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को 1 कैलोरी कहा जाता है।

  3. ब्रिटिश थर्मल यूनिट:- 1 पौंड जल का ताप 1 डिग्री फारेनहाइट बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को ब्रिटिश थर्मल यूनिट कहा जाता है।

 

1 B. Th. Unit - 252 कैलोरी

1 कैलोरी - 4.186 ज़ूल

1 किलो कैलोरी -  4.186 जूल - 1000 कैलोरी

 

ताप (Temperature)

 

ताप किसी वस्तु की उष्मिय अवस्था को बदलता है और एक वस्तु से दूसरी वस्तु में ऊष्मिय ऊर्जा के प्रवाह को निश्चित करता है।

 

ताप की माप:- 

 

  • ताप मापन के लिए उपयोग में लाए जाने वाले उपकरण को तापमापी कहा जाता है।

  • ताप मापन के लिए द्रवों और गैसों के उष्मिया प्रसार का उपयोग करना व्यावहारिक और सुविधाजनक होता है।

 

 

ताप की माप के लिए निम्नलिखित पैमानों का प्रयोग किया जाता है - 

 

  • सेल्सियस पैमाना:- इसका व्यवहार सबसे पहले फ्रांस के वैज्ञानिक सेल्सियस ने किया था। यह 0 डिग्री सेल्सियस  से लेकर 100 डिग्री सेल्सियस  तक 100 भागों में बंटा रहता है।

  • फारेनहाइट पैमाना:- इसका व्यवहार सर्वप्रथम इंग्लैंड के वैज्ञानिक फारेनहाइट ने किया था। यह 32 डिग्री फारेनहाइट से लेकर 212 डिग्री फारेनहाइट तक 180 भागों में बंटा रहता है।

  • केल्विन मापक:- इसका व्यवहार सर्वप्रथम इंग्लैंड के वैज्ञानिक लॉर्ड केल्विन ने किया था। यह 273 K से 373 K तक कुल 100 भागों में बंटा रहता है।

  • केल्विन मापक्रम में लिखते समय डिग्री का प्रयोग नहीं करते हैं।

 

 

परम शून्य ताप:- 

किसी भी वस्तु का ताप -273.15 डिग्री सेल्सियस से कम सामान्य तौर पर नहीं हो सकता इसे है परम शून्य ताप कहते हैं।

 

केल्विन पैमाने पर परम शून्य ताप को OK लिखा जाता है।

अर्थात 

OK = -273.15 डिग्री सेल्सियस

 

सामान्यतः तापमापी में पारा ही भरा होता है जो -30 डिग्री सेल्सियस से 350 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान के लिए प्रयुक्त होता है।

इसके अलावा तापमापी में निम्न गैस भी भरी होती है:- 

 

  • हाइड्रोजन तापमापी:- इसकी सहायता से 500 डिग्री सेल्सियस तक के ताप को मापा जा सकता है।

  • नाइट्रोजन तापमापी:- यह 1500 डिग्री सेल्सियस ताप के मापन के लिए प्रयुक्त होता है।

  • प्लेटिनम प्रतिरोध तापमापी द्वारा :- -200 डिग्री सेल्सियस से 1200 डिग्री सेल्सियस तक के ताप का मापन किया जाता है।

  • तापयुग्म तापमापी:- -200 डिग्री सेल्सियस से 1600 डिग्री सेल्सियस तक के ताप का मापन किया जाता है।

 

 

विशिष्ट ऊष्मा (Specific Heat)

किसी पदार्थ के 1kg द्रव्यमान का ताप 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को उस पदार्थ की विशिष्ट ऊष्मा कहते हैं।

 

ऊष्मा धारिता:- 

किसी वस्तु के 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को उस वस्तु की ऊष्मा धरीता कहते हैं।

 

उष्मिय प्रसार (Thermal expansion):- 

 

किसी वस्तु को गर्म करने पर उसकी लंबाई, क्षेत्रफल एवम् आयतन तीनों में वृद्धि होती है।

 

Important Notes :- प्रायः सभी द्रव का आयतन गर्म करने पर बढ़ता है परन्तु जल 0 डिग्री सेल्सियस से 4 डिग्री सेल्सियस तक गर्म करने पर आयतन घटता है तथा 4 डिग्री सेल्सियस के बाद पुनः जल का आयतन बढ़ता है। इसका अर्थ ये होता है कि 4 डिग्री सेल्सियस पर जल का घनत्व अधिकतम होता है।

 

ऊष्मा का संचरण

प्रकृति में ऊष्मा का एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना ऊष्मा का संचरण कहलाता है।

ये तीन विधियों में होता है:- 

 

  1. चालन

  2. संवहन

  3. विकिरण

 

 

  • ठोसों में ऊष्मा का संचरण चालन विधि द्वारा होता है।

  • गैसों एवम् ड्र द्रव में ऊष्मा का संचरण संबहन विधि द्वारा होता है।

  • वायुमंडल संबहन विधि द्वारा है गरम होती है।

  • सूर्य से पृथ्वी तक ऊष्मा विकिरण विधि द्वारा पहुंचती है।

 

 

न्यूटन का शितलन नियम:- 

समान अवस्था होने पर वस्तु के ठंडे होने की दर वस्तु और उसके चारों ओर के माध्यम के तापांतर के समानुपाती होती है। अतः जैसे जैसे वस्तु ठंडी होती जाएगी, उसके ठंडे होने की दर कम होती चले जाएगी।

 

किरचॉफ का नियम:- 

जो वस्तु ऊष्मा का जितना अच्छा अवशोसक होती है वह उतना अच्छा उत्सर्जक भी होती है। इसी कारण से अंधेरे कमरे में समान रूप से गर्म, काली और सफेद वस्तुएं रखने पर काली वस्तु अधिक चमकेगी क्यों की काली वस्तु अधिक विकिरण उत्सर्जित करती है।

ताप द्वारा अवस्था परिवर्तन

 

  • किसी निश्चित ताप पर किसी पदार्थ के एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तन होने की अवस्था परिवर्तन कहलाती है। 

  • अवस्था परिवर्तन में ताप नहीं बदलता।  

  • जो पदार्थ ठोस से द्रव में बदलने पर सिकुड़ते हैं उनका गलनांक दाब बढ़ाने पर घटता है। जैसे - बर्फ 

  • जो पदार्थ ठोस से द्रव में बदलने पर फैलते हैं उनका गलनांक दाब बढ़ाने पर बढ़ता है। 

  •  नमक मिलाने पर बर्फ का गलनांक घटता है। 

  • गलनांक और हिमांक बराबर होता है। 

  • प्रायः क्वथनांक और संघनन का ताप सामान होता है। 

  • दाब बढ़ाने एवं अशुद्धि मिलाने पर द्रव का क्वथनांक बढ़ता है। 

 

गुप्त ऊष्मा (Latent Heat)

किसी वस्तु की गुप्त ऊष्मा वह परिमाण होती है, जो बिना ताप में परिवर्तन किये उसे एक अवस्था से दूसरी अवस्था में लाने के लिए आवश्यक होती है। 

गलन की गुप्त ऊष्मा (Latent Heat of Fusion)

 

नियत ताप पर किसी द्रव के इकाई द्रव्यमान को वाष्प में बदलने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को ठोस की गलन की गुप्त ऊष्मा कहलाती है। 

वाष्पन की गुप्त ऊष्मा (Latent Heat of  Vaporisation)

नियत ताप पर द्रव के इकाई द्रव्यमान को वाष्प में बदलने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को द्रव की वाष्पन की गुप्त ऊष्मा कहते हैं। 

 

  • गुप्त ऊष्मा का SI मात्रक जूल प्रति किलोग्राम होता है। 

  • जलवाष्प की गुप्त ऊष्मा जल से अधिक होती है। इसी कारण वाष्प से जलने पर अधिक कष्ट होता है। 

 

प्रशीतक (Refrigerator)

  • प्रशीतक में वाष्पीकरण द्वारा ठंडक उत्पन्न की जाती है। 

  • ताम्बे की एक वाष्प कुंडली में द्रव फ्रीऑन भरा रहता है जो वाष्पीकरण होकर ठंडक उत्पन्न करता है। 

 

आपेक्षिक आर्द्रता की माप हाइग्रोमीटर से की जाती है। 

ताप बढ़ने से आपेक्षिक आर्द्रता बढ़ जाती है। 

ऊष्मा गतिकी (Thermodynamics)

ऊष्मा गतिकी का प्रथम नियम (First Law of Thermodyanmics):- 

 

यह नियम ऊर्जा के संरक्षण को प्रदर्शित करता है। 

इस नियम के अनुसार "किसी पिंड को दी जाने वाली ऊष्मा दो प्रकार के कार्यों में व्यय होती है "

  1. पिण्ड की आतंरिक ऊर्जा में वृद्धि करने मं जिससे पिण्ड का ताप बढ़ता है। 

  2. बाह्य कार्य करने में। 

 

समतापी प्रक्रम 

जब किसी पिण्ड में परिवर्तन इस प्रकार हो की निकाय का ताप पूरी क्रिया में स्थिर रहे तो उस परिवर्तन को समतापी पराक्रम कहलाता है। 

रुद्धोष्म प्रक्रम 

यदि किसी पिण्ड में परिवर्तन इस प्रकार हो की पूरी प्रक्रिया के दौरान पिण्ड न तो बाहरी माध्यम को ऊष्मा दे और न ही उससे कोई ऊष्मा ले तो इस परिवर्तन को रुद्धोष्म पराक्रम कहा जाता है। 

ऊष्मा गतिकी का द्वितीय नियम (Second Law of Thermodyanmics):- 

यह नियम ऊष्मा के प्रवाहित होने की दिशा को व्यक्त करता है। इस नियम को निम्न प्रकार से व्यक्त कर :- 

  1. केल्विन के अनुसार - "ऊष्मा का पूर्णतया कार्य करने में परिवर्तन करना असंभव है" 

  2. क्लासियस के अनुसार  - "ऊष्मा अपने कम ताप की वस्तु से अधिक ताप की वस्तु की ओर प्रवाहित नहीं हो सकती"