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प्राचीन भारत (Ancient India)

प्राचीन भारत के इतिहास के स्रोत 

प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी हमें मुख्यतः निम्नांकित स्रोतों से प्राप्त होती है:- 

1. धर्म ग्रंथ एवं ऐतिहासिक ग्रंथ (Religion and Historical Book)

2. विदेशी यात्रियों / तीर्थयात्रियों के विवरण (Details of foreign travelers / pilgrims)

3. पुरातात्विक स्रोत / साक्ष्य (Archaeological Sources / Evidence)

 

1. धर्म ग्रन्थ एवं ऐतिहासिक ग्रंथों से मिली महत्वपूर्ण जानकारियाँ (Important information received from religious books and historical books)

धर्म ग्रंथ अथवा धार्मिक साहित्य को दो भागों में बांटा गया है - 

a) ब्राहम्ण साहित्य (Brahmin literature) और ब्राह्मणेत्तर साहित्य (Non-Brahmin literature)

A. ब्राहम्ण साहित्य (Brahmin literature) 

  • ब्राह्मण साहित्य के अंतर्गत आने वाले प्रमुख ग्रंथ हैं -

  • वेद, वेदांग, उपनिषद, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक, पुराण, स्मृति ग्रंथ, रामायण, महाभारत आदि। 

  • वेद भारत का सबसे प्राचीन धर्मग्रंथ है। 

  • वेदों के संकलनकर्ता - महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास हैं। 

  • सूक्तों, स्तुतियों, प्रार्थनाओं, यज्ञ एवं तंत्र - मंत्रों से सम्बंधित सूत्रों के संग्रह को वेद कहा जाता है। 

  • संस्कृति भाषा के "विद" शब्द से "वेद" शब्द की उत्पत्ति हुई है जिसका अर्थ है "पवित्र एवं आध्यात्मिकक ज्ञान"। 

  • वेद चार हैं :- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वेद 

  • चारों वेदों में सबसे प्राचीन है ऋग्वेद और सबसे नया अथर्वेद है। 

 

ऋग्वेद (Rigveda)

  • ऋचाओं के क्रमबद्ध ज्ञान के संग्रह को "ऋग्वेद" कहा जाता है। 

  • इसमें 8 अष्टक, 10 मंडल, 1028 सूक्त,और 10462 ऋचाएं हैं। 

  • ऋग्वेद की ऋचाओं के पढ़ने वाले ऋषि को "होतृ" कहा जाता था। 

  • वशिष्ठ, विश्वामित्र,भारद्वाज, वामदेव, अत्रि और गृत्स्मद ऋषि ऋग्वेद के पुरुष रचनाकार हैं। 

  • पौलोमी, शची, कांक्षावृत्ति, घोषा और शची नामक महिला ऋषियों ने भी ऋग्वेद की रचना में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 

  • ऋग्वेद में से आर्यों के जीवन व्यवहार, राजनितिक प्रणाली एवं  तत्कालीन इतिहास की जानकारी मिलती है। 

  • ऋग्वेद का रचनाकाल 1500 ई पू से 1000 ई पू माना जाता है। 

  • ऋग्वेद के पहले और दसवें मंडल को अंत में जोड़ा गया है। 

  • ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त  चतुष्वर्ण समाज का जिक्र है। 

  • इसके अनुसार चार वर्ण - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ब्रह्माजी के क्रमशः मुख, भुजाओं, जंघाओं और चरणों से उत्पन्न हुए हैं। 

  • ऋग्वेद में  समाज के चारों वर्णों के दायित्वों, व्यवसायों, सामाजिक - जातिगत स्थितियों व् विशेषाधिकारों एवं कर्तव्यों का स्पष्ट वर्णन है। 

  • ऋग्वेद में इंद्र के लिए 250 और अग्नि के लिए 200 ऋचाएं मिलती हैं। 

  • गायत्री मंत्र ऋग्वेद का सबसे प्रचलित या लोकप्रिय ग्रंथ है। 

  • वैदिक साहित्य में ऋग्वेद के पश्चात् शतपथ ब्राह्मण का प्राचीन इतिहास के साधन के रूप में महत्वपूर्ण स्थान है। 

  • ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्वेद संहिता कहलाते हैं। संहिता का अर्थ संकलन होता है। 

  • ऋग्वेद के दो ब्राह्मण ग्रंथ हैं :- ऐतरेय और कौषीतकि (शंखायन)

  • ऋग्वेद में ही वामनावतार के तीन पगों के आख्यान उल्लेखित है। 

 

यजुर्वेद (Yajurved)

  • यजुर्वेद कर्मकांड प्रधान ग्रंथ है जो गध (गाया  जाने वाला ) और पध (पढ़ा जाने वाला) दोनों में है। 

  • यजुर्वेद में यज्ञों के नियमों और विधि - विधानों का उल्लेख मिलता है। 

  • यजुर्वेद के मन्त्रों को उच्चारित करने वाले पुरोहित को अध्वार्यू  कहा जाता था। 

 

सामवेद (Saamved)

  • सामवेद का शाब्दिक अर्थ है - "गान" अर्थात यह गयी जा सकने वाली ऋचाओं का संकलन है। 

  • सामवेद में 1549 ऋचाएं हैं। 

  • इसमें वर्णित देवता  "सविता" या "सूर्य" हैं। 

  • सामवेद के मंत्रों के पाठकर्ता अथवा पुरोहित जो मन्त्रों को उच्चारित करता है उसे "उद्गात्र" कहा जाता है। 

  • सामवेद में गाने योग्य मंत्रों के संकलन के कारण ही इसे भारतीय संगीत का जनक कहा जाता है।

 

अथर्वेद (Atharvaveda)

  • अथर्वा ऋषि द्वारा इस वेद के रचित होने के कारण ही इसका नाम अथर्वेद पड़ा। 

  • इस वेद के दूसरे दृष्टा थे "आंगिरस" ऋषि, जिस कारण इस ग्रंथ को "अथर्वांगिरस" वेद भी कहा जाता है। 

  • साथ ही इसे "भेशन वेद" भी कहा जाता है। 

  • अथर्वेद में 731 सूक्त, 20 अध्याय और प्रायः 6000 मंत्र मिलते हैं। 

  • अथर्वेद में धर्म, औषधि, जादू - टोना, ब्रह्मज्ञान, शाप, वशीकरण, रोग निवारण, स्तुति, आशीर्वाद, प्रायश्चित, प्रेम, विवाह, राजकर्म, मनुष्योंके सामान्य विचारों - विश्वासों - अंधविश्वासों इत्यादि का वर्णन मिलता है। 

  • इस वेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां सम्बोधित किया गया है। 

  • इस वेद में कुरुओं के राजा परीक्षित की भी चर्चा की गयी है। 

  • आर्य - अनार्य समन्वय की चर्चा भी इस वेद में मिलती है। 

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