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गॉड पार्टिकल (God particle)

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हम अपने आस-पास पेड़-पौधे, जीव-जंतु के अलावा तरह-तरह की चीजें देखते हैं।

हम आसमान में सूर्य, चांद और तारे देखते हैं। लेकिन एक समय था जब यह चीजें नहीं थीं।

वह समय था बिग बैंग की घटना से पहले का। उस समय न तो समय और न ही स्थान नाम की कोई चीज होती थी।

12 से 14 अरब वर्ष पहले हमारा पूरा ब्रह्मांड एक बिंदु में सिमटा हुआ था। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि दुनिया में जब कुछ मौजूद ही नहीं था, इतनी सारी चीजें अस्तित्व में कैसे आईं।

इन्हीं सवालों का हम "बिग बैंग" और "हिग्स बोसन" यानी "गॉड पार्टिकल" के जरिए जवाब देने की कोशिश करेंगे।

आइए आज जानते हैं कि कैसे एक जगह सिमटी हुई एक इकाई से दुनिया का वजूद संभव हुआ...


बिग बैंग

1927 में "जॉर्जिस लेमाइटर" ने "बिग बैंग" के सिद्धांत का प्रस्ताव रखा था।

1929 में ऐडविन हबल नाम के वैज्ञानिक ने इस सिद्धांत का विश्लेषण और अध्ययन किया।

स्टीफन हॉकिंग ने इसे यूं समझाया, करीब 15 अरब साल पहले पूरा ब्रह्मांड एक बिंदु के रूप में सिमटा हुआ था। या यूं समझ लीजिए कि पूरी दुनिया की रचना जिन कणों और ऊर्जा के कारण संभव हुई, वह एक छोटे से गेंद जैसी चीज में समाए हुए थे। फिर अचानक से एक घटना हुई और बिंदु में मौजूदा कण हर तरफ फैल गए। ये कण तेजी से एक-दूसरे से दूर भागने लगे। इस घटना को ही बिग बैंग के नाम से जाना जाता है। वैसे बिग बैंग को कुछ लोग महाविस्फोट समझ लेते हैं और कहते हैं कि एक महाविस्फोट से दुनिया का जन्म हुआ है। लेकिन यह सही नहीं है। हकीकत यह है कि अचानक ब्रह्मांड के सिमटे हुए बिंदु का विस्तार शुरू हो गया था जो अब तक जारी है।


हिग्स बोसोन
दुनिया में मौजूद सभी चीजों का निर्माण कणों से हुआ है। कणों ने मिलकर चीजों को बनाया। बात इस तरह से है, हमारे ब्रह्मांड में मौजूद सभी चीजें ऐटम से मिलकर बनी हैं। एक ऐटम इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और प्रोटॉन नाम के तीन कणों से बना होता है। ये कण भी सबऐटॉमिक पार्टिकल से मिलकर बने होते हैं जिनको क्वार्क कहा जाता है। इन कणों का द्रव्यमान अब तक रहस्य बना रहा है। प्रोटॉन और न्यूट्रॉन जैसे कणों में द्रव्यमान यानी वजन होता है जबकि फोटॉन में नहीं होता है। यह एक गुत्थी थी कि आखिर कुछ कणों में वजन होता है जबकि कुछ में नहीं। आखिर ऐसा क्यों होता है, इस गुत्थी को "
पीटर हिग्स" और पांच अन्य वैज्ञानिकों ने साल 2012 में सुलझाने की कोशिश की।

यह सिद्धांत भारतीय वैज्ञानिक "सत्येंद्र नाथ बोस" के "बोसॉन सिद्धांत" ही आधारित था। इसे ही बाद में "हिंग्स - बोसोन" के नाम से जाना गया। इस सिद्धांत ने ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के रहस्यों से पर्दा भी उठाया और उसके स्वरूप को परिभाषित करने में मदद भी की। 

उन्होंने "हिग्स बोसोन" का सिद्धांत दिया। उनके सिद्धांत के मुताबिक, बिग बैंग के तुरंत बाद किसी भी कण में कोई वजन नहीं था। जब ब्रह्मांड ठंडा हुआ और तापमान एक निश्चित सीमा के नीचे गिरता चला गया तो शक्ति की एक फील्ड पूरे ब्रह्मांड में बनती चली गई। उस फील्ड के अंदर बल था और उसे हिग्स फील्ड के नाम से जाना गया। उन फील्ड्स के बीच कुछ कण थे जिनको पीटर हिग्स के सम्मान में हिग्स बोसोन के नाम से जाना गया। इसे ही गॉड पार्टिकल भी कहा जाता है। उस सिद्धांत के मुताबिक, जब कोई कण हिग्स फील्ड के प्रभाव में आता है तो हिग्स बोसोन के माध्यम से उसमें वजन आ जाता है। जो कण सबसे ज्यादा प्रभाव में आता है, उसमें सबसे ज्यादा वजन होता है और जो प्रभाव में नहीं आता है, उसमें वजन नहीं होता है। उस समय तक सिर्फ यह अनुमान था कि हिग्स बोसोन नाम का कण ब्रह्मांड में मौजूद है लेकिन जुलाई 2012 में स्विटजरलैंड में वैज्ञानिकों ने हिग्स कण के खोजने की घोषणा की।



गॉड पार्टिकल क्यों अहम है?
हमारी इस दुनिया की रचना में भार या द्रव्यमान का खास महत्व है। भार या द्रव्यमान वह चीज है जिसको किसी चीज के अंदर रखा जा सकता है। अगर कोई चीज खाली रहेगी तो उसके परमाणु अंदर में घूमते रहेंगे और आपस में जुड़ेंगे नहीं। जब परमाणु आपस में जुड़ेंगे नहीं तो कोई चीज बनेगी नहीं। जब भार आता है तो कण एक-दूसरे से जुड़ता है जिससे चीजें बनती हैं। ऐसा मानना है कि इन कणों के आपस में जुड़ने से ही चांद, तारे, आकाशगंगा और हमारे ब्रह्मांड की अन्य चीजों का निर्माण हुआ है। अगर कण आपस में नहीं मिलते तो इन चीजों का अस्तित्व नहीं होता और कणों को आपस में मिलाने के लिए भार जरूरी है।

यूं नाम पड़ा गॉड पार्टिकल
अमेरिका के एक वैज्ञानिक "लेऑन लीडरमैन" ने 1993 में एक पुस्तक लिखी थी। उस पुस्तक में उन्होंने कणों के द्रव्यमान और परमाणु के बनने की प्रक्रिया को समझाया था। उन्होंने किताब का नाम "The Goddamn Particle" रखा था। लेकिन प्रकाशक को यह नाम पसंद नहीं आया तो उन्होंने इसका नाम बदलकर "The God Particle" कर दिया। इस तरह से इसको गॉड पार्टिकल कहा जाने लगा। इसका भगवान से कोई लेना-देना नहीं है। दरअसल इंग्लिश के शब्द Goddamn को गुस्सा या चिड़चिड़ाहट व्यक्त करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसी चीज को ध्यान में रखते हुए लीडरमैन ने गॉडडैम का इस्तेमाल किया ताकि वह यह दिखा सके कि इस कण को खोजने में कितनी परेशानी का सामना करना पड़ा।