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हूण जाती और वाकाटक वंश

हूण जाती और वाकाटक वंश
    हूण जाती के लोग "बर्बर स्वभाव" के थे।

    हूण जाती मध्य एशिया की जाती थी।

    हूणों ने गुप्तकाल में भारत पर आक्रमण किया था।

    "मिहिरकुल" तथा "तोरमाण" हूण जाती के प्रमुख बर्बर आक्रमणकर्ता थे।

    हूणों ने अपने बार बार आक्रमण से गुप्तवंश की शक्ति को क्षीण कर दिया जिसमें कई छोटे - छोटे स्वतंत्र राज्य उदीयमान हुए।

    हूण आक्रमण पांचवी शताब्दी के अंत तक खत्म हो गए।

    बहुत से हूण लोग जो भारत में रह गए, बस गए, उनमें से कई लोगों ने हिन्दू धर्म को स्वीकार कर लिया था।

    भारत में हूणों के वंशज आज भी भारत में राजपूत जाती और गुर्जर जातियों में पाए जाते हैं।

    वाकाटक वंश

    ब्राह्मणवसंशीय विंध्यशक्ति ने वाकाटक वंश की स्थापना की थी।

    विंध्यशक्ति शासक बनाने से पूर्व "बरार" का सामंत था।

    विंध्यशक्ति का शासनकाल 255 - 275 ई तक था।

    विंध्यशक्ति का उत्तराधिकारी "प्रवरसेन" था।

    प्रवरसेन का शासनकाल 275 - 335 ई तक था।

    प्रवरसेन ने चार अश्वमेघ यज्ञ किये थे।

    प्रवरसेन ने सम्राट की उपाधि धारण की थी।

    प्रवरसेन के उत्तराधिकारी "रुद्रसेन प्रथम" ने 335 - 360 ई तक शासन किया।

    रुद्रसेन प्रथम के उत्तराधिकारी उसके पुत्र "पृथ्वीसेन" इ 360 - 385 ई तक शासन किया था।

    पृथ्वीसेन को प्रयाग प्रशस्ति में "कुन्तलेंद्र" कहा गया है।

    चन्द्रगुप्त द्वितीय ने वाकाटक वंश से वैवाहिक सम्बन्ध बनाया था।

    चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री "प्रभावती" का विवाह पृथ्वीसेन प्रथम के प्रथम पुत्र "रुद्रसेन द्वितीय" से किया था।

    रुद्रसेन द्वितीय ने 385 - 390 ई तक शासन चलाया।

    रुद्रसेन द्वितीय ने पहले शैव धर्म स्वीकार किया था बाद में वह "वैषणव धर्म" का उपासक बन गया था।

    रुद्रसेन द्वितीय की मृत्यु हो गयी तो उसकी पत्नी "प्रभावती" ने पाने पुत्रों की संरक्षिका के तौर पर 410 ई तक शासन का कार्य भर संभाला था।

    प्रवरसेन ने महाराष्ट्रीय प्राकृत भाषा में "सेतुबंध" नामक काव्य पुस्तक की रचना की थी।

    वाकाटक वंश का अंतिम शासक "पृथ्वी सेन द्वितीय" था।