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गुप्त साम्राज्य का प्रशासन Part I

गुप्त साम्राज्य का प्रशासन Part I
    गुप्त काल में प्रशासन की सबसे छोटी इकाई "ग्राम" थी।

    ग्राम का प्रशासन "ग्रामसभा" द्वारा संचालित होता था।

    ग्राम सभा का मुखिया "ग्रामिक" कहलाता था।

    ग्राम सभा के अन्य सदस्य "महत्तर" कहलाते थे।

    ग्राम समूहों की छोटी इकाई "पेठ" कहलाती थी।

    गुप्त साम्राज्य में सबसे बड़ी प्रादेशिक इकाई "देश" थी।

    देश का प्रमुख "उपरीक" कहलता था।

    गुप्त साम्राज्य की दूसरी प्रादेशिक इकाई "भुक्ति (प्रांत)" कहलाता था, जिसका प्रमुख "उपरिक" कहलाता था।

    भुक्ति के निचे की प्रांतीय इकाई "विषय" कहलाती थी, जिसका प्रमुख "विषयपति" कहलाता था।

    गुप्त साम्राज्य प्रांतों, विषयों और ग्रामों में विभक्त था।

    गुप्त साम्राज्य में सामान्य पुलिस कर्मचारी "चाट" और "भाट" कहलाते थे।

    गुप्त साम्राज्य में पुलिस विभाग के मुख्य अधिकारी को "दण्डपाशिक" कहा जाता था।

    दुराचार रोकने वाले अधिकारी "कुल - पुत्र" कहलाते थे।

    फांसी दिए जाने वाले स्थान को "बध्यस्थान" कहा जाता था।

    कुमारगुप्त के शासन में भूमि बिक्री सम्बन्धी अधिकारियों के विषय में जानकारी "दामोदर ताम्रपत्र" से मिलती है।

    गुप्तकाल में राजस्व का मुख्य स्रोत "भू - राजस्व् " था।

    गुप्तकाल में 16 प्रतिशत से लेकर 25 प्रतिशत का भू - राजस्व वसूला जाता था।

    यह कुल उत्पादन का 1/ 4 भाग से 1/6 भाग तक।

    गुप्तकाल में जो व्यक्ति जंगल भूमि को कृषि योग्य बनता था वही उस भूमि का मालिक कहलाता था।

    गुप्तकाल में श्रेणी के प्रधान को "ज्येष्ठक" कहा जाता था।

    गुप्तकाल में व्यापार का प्रमुख केंद्र "उज्जैन" था।

    गुप्तकाल में सर्वाधिक प्रमुख विभाग "सैन्य विभाग" था।

    सेना के मुख्य अधिकारी "सन्धिविग्रहिका" कहलाता था।

    इसे युद्ध करने और संधि करने का अधिकार प्राप्त था।

    सेना के कार्यकाल को "बलाधिकरण" कहा जाता था।

    गुप्तकाल के सैन्य अधिकारी "महासेनापति" या "महादण्डनायक", "बलाधिकृत (सैनिकों की नियुक्ति करने वाले)", "रणभांडगरिक (सैनिक सामानों का अधिकारी)", "भटश्वपति (पैदल एवं घुड़सवारों का अध्यक्ष)" आदि थे।

    गुप्तकालीन प्रसिद्ध मंदिरों का विवरण निम्नप्रकार है:-

    विष्णु मंदिर (स्थान - तिगवा, जबलपुर, मध्यप्रदेश)

    दशावतार मंदिर (स्थान - देवगढ़, उत्तरप्रदेश)

    शिव मंदिर (स्थान - भूमरा, नागौढ़ा, मध्यप्रदेश)

    शिव मंदिर (स्थान - खोह, नाडौदा, मध्यप्रदेश)

    पार्वती मंदिर (स्थान - नयना, मध्यप्रदेश)

    लक्षमण मंदिर (स्थान - कानपुर, उत्तरप्रदेश)

    भीतर गाँव मंदिर (स्थान - भीतर गाँव, कानपुर, उत्तरप्रदेश)

    गुप्त काल में न्याय व्यवस्था श्रेष्ठ थी।

    न्याय विभाग का सर्वोच्च अधिकारी "सम्राट" कहलता था।

    सम्राट का निर्णय अंतिम माना जाता था।

    समुद्रगुप्त ने 6 प्रकार की स्वर्ण मुद्राएं जारी की थीं।

    समुद्रगुप्त द्वारा जारी की गयी स्वर्ण मुद्राओं में सर्वाधिक लोकप्रिय "गरुड़ मुद्रा" थी।

    चन्द्रगुप्त द्वारा जारी किये गए स्वर्ण मुद्राओं में चन्द्रगुप्त और उसकी पत्नी का चित्र एक तरफ और दूसरी तरफ "सिंह पर आसीन दुर्गा" का चित्र अंकित था।

    समुद्रगुप्त के अश्व, व्याघ्र प्रकार के सिक्के उस काल के मुद्राकला के उत्कृष्ट उदाहरण थे।

    गुप्तकाल में समाज चार वर्णों - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में विभाजित था।

    गुप्तकाल में ब्राह्मणों को उच्च और विशेष स्थान प्राप्त था।

    साथ ही ब्राह्मणों को कर मुक्त भी रखा गया था।

    कायस्थों का सर्वप्रथम वर्णन "याज्ञवल्क्य स्मृति" में हुआ है।

    जाती के रूप में कायस्थों का वर्णन "ओशनम स्मृति" में मिलता है।

    गुप्त काल में पर्दा प्रथा केवल उच्च वर्ग की महिलाओं तक सिमित था।

    गुप्तकाल में सती प्रथा का भी प्रचलन था।

    पहली बार किसी महिला के सती होने का प्रमाण "भानुगुप्त" के "ऐरण अभिलेख" से प्राप्त होता है।

    भोजराज की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी के सती होने का वर्णन "भानुगुप्त" के "ऐरण अभिलेख" में मिलता है।

    गुप्तकाल में वैश्यावृत्ति करने वाली महिलाएं "गणिका" और वृद्ध वैश्याएं "कुट्टनी" कहलाती थी।

    गुप्त सम्राट "वैष्णव धर्म" के अनुयायी थे।

    गुप्त सम्राटों ने "वैशन धर्म" को राजधर्म बनाया था।

    गुप्त सम्राटों का राजकीय चिन्ह विष्णु का वाहन "गरुड़" था।

    गुप्तकाल में वैष्णव धर्म समबन्धित सबसे महत्वपूर्ण अवशेष "देवगढ़ (झांसी)" का प्रसिद्ध "दशावतार मंदिर" है।

    दशावतार मंदिर में गुप्तकालीन विष्णु की प्रसिद्ध मूर्ति विराजमान है।