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सिंधु घाटी सभ्यता Part - II

  • हड़प्पा में "श्रमिकों के निवास" करने के लिए विशेष भवनों के निर्माण किये जाने के भी साक्ष्य मिले हैं। 

  • "फर्श पर अलंकृत ईंटों" का प्रयोग मात्र "कालीबंगन" में ही किया गया था पाया गया है। 

  • हड़प्पा के कुछ बर्तनों पर "मानव आकृतियां" मिलीं तो कुछ बरतनों पर कुछ "लेख" मिले हैं। 

  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त किसी भी बरतन पर कोई भी लेख नहीं मिला है। 

  • हड़प्पा का "भंडारागार" के प्रमुख प्रवेश द्वार नदी की ओर खुलता था। 

  • सैधव सभ्यता में तौल की इकाई सम्भवतः "16" के अनुपात में थी। 

  • मनके बनाने के कारखाने अवशेष "लोथल एवं चन्हूदड़ो" से प्राप्त हुए हैं। 

  • "धान की खेती" के साक्ष्य "लोथल और रंगपुर" से प्राप्त हुए हैं। 

  • "लोथल और रंगपुर" से चावल के दाने भी प्राप्त हुए हैं। 

  • सैंधव सभ्यता में घर के दरवाजे और खिड़कियाँ "घर के पीछे की ओर" खुलते थे। 

  • सैंधव सभ्यता का "लोथल" ही मात्र एक ऐसा नगर था जहाँ घर के दरवाजे और खिड़कियाँ घर के मुख्य द्वार की ओर खुलते थे। 

  • सैंधव सभ्यता की लिपि "भावचित्रात्मक" थी। 

  • सैंधव सभ्यता की यह लिपि "दाएं से बाएं" की ओर लिखी जाती थी, परन्तु यदि एक से अधिक पंक्तियाँ होतो पहली पंक्ति "दाएं से बाएं" और दूसरी पंक्ति को "बाएं से दाएं" की ओर लिखते थे। 

  • यही क्रम पूरा लेख लिखने में दोहराया जाता था। 

  • सैंधव काल के घोड़े के अस्थि पंजर "लोथल, कालीबंगा और सुतकोतदा" से प्राप्त हुए हैं। 

  • सिंधु सभ्यता के लोग यातायात के लिए दो पहिये अथवा चार पहिये की बैलगाड़ी अथवा भैंसगाड़ी का प्रयोग करते थे।

  • "मेसोपोटामिया" के अभिलेखों में सिंधु के लिए "मेलुहा" शब्द का प्रयोग किया गया है। 

  • सैंधव सभ्यता के लोग पृथ्वी को अनाज देने वाली देवी मानकर धरती की पूजा व् उपासना भी करते थे

  • सैंधव सभ्यता में "वृक्षों" की पूजा भी की जाती थी। 

  • सिंधु निवासियों द्वारा "शिव पूजा" किये जाने के प्रमाण मिले हैं। 

  • हड़प्पा वासी "सूर्य की पूजा और उपासना" करते थे। 

  • हड़प्पा में "स्वास्तिक" के निशान भी मिले हैं। 

  • संभवतः "स्वास्तिक" चिन्ह हड़प्पा की देन है। 

  • सिंधु घाटी के किसी भी नगर में मंदिरों के अवशेस नहीं मिले हैं। 

  • सैंधव सभ्यता में "मातृदेवी की उपासना" ही सर्वाधिक प्रचलित थी। 

  • "कूबड़ वाला सांढ़" सिंधु निवासियों के लिए विशेष तौर पर पूजनीय था। 

  • सिंधु निवासी मातृ पूजा, शिव पूजा, योनि पूजा, जल पूजा, सूर्य पूजा, वृक्ष पूजा, पशु पूजा  . 

  • सिंधु निवासी तंत्र-मंत्र, जादू - टोना - टोटका में भी विश्वास  करते थे। 

  • स्त्रियों की मिटटी की मूर्तियां अधिक संख्या में मिलने से यह अनुमान लगया जाता है की वह समाज "मातृसत्तात्मक" था। 

  • सैंधव सभ्यता में मिटटी की मूर्तियां सांचे में न ढाल कर हाथों से ही बनाया जाता था। 

  • "नर्तकी" की मूर्ति मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई है। 

  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त नर्तकी की मूर्ति से यह अनुमान लगाया जा सकता है की सैंधव काल में "देवदासी" की प्रथा प्रचलन में थी। 

  • सैंधव सभ्यता के लोग "काले रंग से डिजाइन" किये हुए "लाल मिटटी के बरतन" का निर्माण करते थे। 

  • सिंधु निवासी आग में मिटटी को पकाते थे जिसे "टेराकोटा" कहा जाता था। 

  • सिंधु सभ्यता में "पर्दा - प्रथा" एवं "वेश्यावृत्ति" के भी प्रचलित होने के साक्ष्य मिले हैं। 

  • सैंधव समाज में लोग मनोरंजन केलिए शिकार करते, मछलियां पकड़ते, पशु - पक्षियों को आपस में लड़ाते, चौपड़ पासा खेलते, नाचते, गाते - बजाते थे। 

  • सिंधु सभ्यता में स्त्रियाँ श्रृंगार प्रसाधनों का भी प्रयोग करती थीं। 

  • सैंधव सभ्यता में सोने - चाँदी, हांथी दाँत, सीप एवमं ताँबे से बने आभूषण प्रचलित थे। 

  • आयात - निर्यात का कार्य सिंधु निवासी जलीय मार्ग से नावों द्वारा करते थे। 

  • जलीय मार्ग के कार्य के लिए सिंधु निवासी "मस्तूल वाली नावों" का प्रयोग करते थे। 

  • सिंधु निवासी गेंहू, जौ के साथ - साथ तिल की भी खेती करते थे। 

  • सिंधु सभ्यता में समाज चार वर्गों में विभक्त था -  पुरोहित, व्यवसायी एवं शिल्पी, कृषक एवं मजदूर। 

  • सिंधु सभ्यता में मृतक संस्कार तीन प्रकार से होते थे - पूर्ण समाधि,आंशिक समाधि और दाह संस्कार

  • दाह  संस्कार में पुरे शरीर को जलाकर भस्म कर दिया जाता था। 

  • "शवों को दफनाने" का साक्ष्य  "हड़प्पा" से प्राप्त हुए हैं। 

  • "शवों को जलाने" का साक्ष्य "मोहनजोदड़ो" से प्राप्त हुए हैं। 

  • "समाधियों" के साक्ष्य "कालीबंगा" से प्राप्त हुए हैं। 

  • मोहनजोदड़ो का आकर प्रायः एक वर्ग मील है। 

  • मोहनजोदड़ो पूर्वी और पश्चिमी दो खण्डों में विभक्त था। 

  • मोहनजोदड़ो का पूर्वी खण्ड, पश्चिमी खण्ड की तुलना में बड़ा है। 

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