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उत्तरवैदिक काल (Post vedic Period)

  • उत्तर वैदिक काल में विशाल साम्राज्यों का उदय हुआ। 

  • उत्तर वैदिक काल में सभी राजा चक्रवर्ती पद को पाने हेतु लालायित रहते थे। 

  • चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए राजागण "अश्वमेघ यज्ञ" और "राजसूय यज्ञ" भी किया करते थे। 

  • उत्तर वैदिक काल में राजा का पद वंशागत बन चूका था। 

  • राजा की शक्ति को धर्म और ब्र्हामण नियंत्रित करते थे। 

  • राजा के दरबार में "रत्निन" उच्च अधिकारी होता था। 

  • उत्तरवैदिक काल में प्रजापति सर्वाधिक सम्मानित देवता हो गए जबकि इंद्र का महत्व काम हो गया था। 

  • विष्णु और रूद्र देवताओं का भी महत्व बढ़ गया था उत्तर वैदिक काल में। 

  • घर्म में कर्माण्ड और यज्ञ का महत्व बढ़ गया था। 

  • उत्तर वैदिक काल में समीति सबसे बड़ी राजनितिक संस्था थी जहाँ सार्वजानिक कार्य के लिए वाद - विवाद द्वारा निर्णय लिया जाता था। 

  • राजा सर्वोच्च न्यायाधीश होते थे। 

  • उत्तर वैदिक काल में सबसे गंभीर अपराध "राजद्रोह" को माना जाता था। 

  • उत्तर वैदिक काल में वर्णों का निर्धारण व्यवसाय के स्थान पर जन्म के आधार पर निर्धारित होने लगा था। 

  • उत्तर वैदिक काल में समाज चार भागों में बंटा था - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र 

  • श्रम विभाजन के आधार पर जातियों और उपजातियों का निर्माण हो रहा था उत्तर वैदिक काल में। 

  • मनुष्य का जीवन चार आश्रमों में बंटा था - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास 

  • उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों के सम्मान और महत्व में गिरावट आ गयी थी। 

  • यजुर्वेद और उपनिषदों की रचना उत्तरवैदिक काल में हुई थी। 

  • उत्तर वैदिक काल में मुख्यतः धर्म, तर्कशास्त्र, दर्शन, इतिहास, नक्षत्र व् ज्योतिष विधा की शिक्षा दी जाती थी। 

  • "राष्ट्र" शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम उत्तरवैदिक काल में किया गया था। 

  • उत्तरवैदिक काल में ही महर्षि वाल्मीकि ने "रामायण" की और महर्षि वेदव्यास ने "महाभारत" की रचना की थी। 

  • "गोत्र" नामक संस्था उत्तरवैदिक काल में अस्तित्व में आयी। 

  • स्मृति ग्रंथों में संस्कारों का उल्लेख मिलता है। 

  • संस्कारों की कुल संख्या 16 है, जिनका विवरण निम्नवत है :- 

  1. गर्भाधान - संतान प्राप्ति के लिए 

  2. पुंसवन - पुत्र प्राप्ति के लिए 

  3. नामकरण - नाम रखने के लिए 

  4. अन्नप्राशन - पहली बार अन्न खिलाना 

  5. जातकर्म - जन्म सम्बन्धी 

  6. चूड़ाकरण - मुंडन 

  7. निष्क्रमण - प्रथम बार घर से बाहर निकलना 

  8. सीमन्तोन्नयन - गर्भ शिशु की रक्षा हेतु 

  9. कर्ण - भेद - कानों में आभूषण धारण करने के लिए छिद्र करना 

  10. उपनयन - बालक एक शिक्षा ग्रहण करने के योग्य होना 

  11. विधारंभ - शिशु को अक्षर ज्ञान करना 

  12. वेदारम्भ -वेद का अध्ययन आरम्भ करना 

  13. समावर्तन - अध्यन की समाप्ति 

  14. केशान्त - बालक के 16 वर्ष का होने पर 

  15. विवाह - स्त्री पुरुष का विवाह 

  16. अंत्येष्टि - मृत्यु पर किया जाने वाला