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उत्तरवैदिक काल (Post Vedic Period) Part - II

  • उत्तरवैदिक काल में "कौशाम्बी" नामक नगर में प्रथम बार पक्की ईंटों के प्रयोग किये जाने का उल्लेख मिलता है।

  • उत्तरवैदिक काल में "निष्क" और "शतमान" मुद्रा की सर्वमान्य इकाइयां थीं। 

  • भारत के सभी दर्शनों में "सांख्य दर्शन" सर्वाधिक प्राचीन है। 

  • सांख्य दर्शन के अनुसार मूल तत्वों की संख्या 25 है। 

  • सांख्य दर्शन के अनुसार "प्रकृति" को पहला तत्व माना गया है। 

  • गायत्री मंत्र का सम्बन्ध सावित्री (सूर्य) नामक देवता से है। 

  • इस मंत्र का लुल्लेख इसी काल में रचित वे - ऋग्वेद में मिलता है। 

  • मनुस्मृति में 10 यमों का उल्लेख मिलता है। जो निम्न प्रकार से हैं:- 1. ब्रह्मचर्य 2. दया 3. क्षमा 4. ध्यान 5. सत्य  6. नम्रता 7. अहिंसा 8. चोरी न करना 9. मधुर स्वभाव 10. इन्द्रिय दमन 

  • उत्तर वैदिक काल में "पांचाल" सर्वाधिक विकसित व् सम्पन्न राज्य था। 

  • शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ  में "पांचाल" को वैदिक सभ्यता के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि की संज्ञा दी गयी है। 

  • पुरुषार्थों की संख्य चार मानी गयी थी।  जो निम्नवत  हैं:- 1. धर्म 2. काम 3. अर्थ 4. मोक्ष 

  • ऋणों (कर्ज) की संख्या प्राचीन काल में तीन थी। जो निम्नवत  हैं:- 1. पितृ ऋण 2. ऋषि ऋण 3. देव ऋण 

  • एक वाद्य यंत्र जिसमें 100 तार लगे हुए थे "शतन्तु" कहलता था। 

  • उत्तर वैदिक कल में कुछ हल इतने बड़े होते थे की उन्हें 24 बैलों की सहायता से खिंचा जाता था,  तभी उनसे खेती का काम होता था। 

  • उत्तरवैदिक काल में 8 प्रकार के विवाहों का प्रचलन था। 

  • "पुरुषमेघ यज्ञ" में घोड़े के स्थान पर मनुष्य की बलि दी जाती थी। 

  • ईशोपनिषद में "निष्काम कर्म सिद्धांत" का उल्लेख वर्णित है। 

  • कठोनिषद में "यम" और "नचिकेता" की कहानी वर्णित है। 

  • गृहस्थ आर्यों द्वार सम्पन्न किये जाने वाले पंच महायज्ञ निम्नवत हैं:- 

  1. ब्रह्म यज्ञ अथवा ऋषि यज्ञ - प्राचीन ऋषि - मुनियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने हेतु। 

  2. देवज्ञ - देवताओं प्रति कृतज्ञता प्रकट करने हेतु। 

  3.  नृयज्ञ या पितृयज्ञ - पितरों को तर्पण देना। 

  4. मनुष्य यज्ञ - अतिथि सत्कार करने हेतु। 

  5. भूत यज्ञ - समस्त जीव - जंतुओं को कृतज्ञता प्रकट करना। 

  • नोट - पंचमहायज्ञ के अलावा इन यज्ञों का भी उल्लेख मिलता है - हर्वियज्ञ और सोमयज्ञ 

  • मनुस्मृति में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख मिलता है जिन्हें दो श्रेणियों में बांटा गया है -

  • 1. प्रशंसनीय विवाह और 2. निंदनीय विवाह 

  • प्रशंसनीय विवाह निम्नवत हैं :- 

  1. ब्रह्म विवाह - कन्य के वयस्क होने पर उसके माता - पिता द्वारा योग्य वर खोजकर, उससे अपनी कन्या का विवाह समाज के सामने करना। 

  2. दैव विवाह - यज्ञ कांरवाले पुरोहित के साथ अपनी कन्या का विवाह करना। 

  3. आर्य विवाह - कन्या  के पिता के द्वारा यज्ञ कार्य के लिए एक अथवा दो गाय के बदले में अपनी कन्या का विवाह करना। 

  4. प्रजापत्य विवाह - वर द्वारा कन्या के पिता से उसकी कन्या को मांगकर विवाह करना। 

  •  निंदनीय विवाह निम्नवत हैं :- 

  1. असुर विवाह - धन के बदले में कन्य के पिता के द्वारा उसका विक्रय (बेचना) करना। 

  2. गंधर्व विवाह - प्रेम या कामुकता के वशीभूत होकर किसी कन्या अथवा पुरुष द्वारा विवाह करना। 

  3. पैशाच विवाह - सोइ हुई अथवा पागल कन्या  के साथ सहवास करना।

  4. राक्षस विवाह - किसी कन्या को छीनकर उसके साथ बलपूर्वक विवाह कर लेना। 

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