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कलिंग नरेश खारवेल

  •  कलिंग राज्य का भारतीय इतिहास में विशिष्ट स्थान है। 

  • सम्राट अशोक के बाद उसके अयोग्य उत्तराधिकारियों के शासन काल के दौरान कलिंग पर "चेदिवंश" के शासको ने अधिकार कर लिया था। 

  • चेदिवंश का संस्थापक "महामेघवाहन" था। 

  • चेदिवंश में मात्र  तीन शासक हुए - महामेघवाहन, खारवेल और कुदेप। 

  • चेदिवंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक "खारवेल" था। 

  • खारवेल 'शुंगों" का समकालीन था। 

  • खारवेल के शासनकाल में कलिंग अत्यंत शक्तिशाली राज्य माना जाता था। 

  • उदयगिरि के "हाथी गुम्फा" अभिलेख से खारवेल के इतिहास की जानकारी मिलती है। 

  • 15 वें वर्ष की उम्र में खारवेल युवराज बना और 28 वें वर्ष की उम्र में राजा बना। 

  • खारवेल 'जैन धर्म" का अनुयायी था। 

  • खारवेल को ऐश, महाराज, महामेघवाहन, कलिंगाधिपति आदि उपाधियों से सम्मानित किया गया था। 

  • खारवेल ने मगध के राजा को पराजति किया और साथ ही कलिंग वापस लौट गया। 

  • खारवेल के शासन का विस्तार पूरी, कटक, गंजाम और विशाखापट्टनम तक था। 

  • खारवेल की सैन्य शक्ति व् पराक्रम के समक्ष "यवन सेनापति" भी  टिक नहीं सका और वो भागकर "मथुरा में शरण" लेने चला गया। 

  • खारवेल ने जैन भिक्षुओं के लिए कई गुफाओं का निर्माण करवाया था। 

  • मगध और अंग राज्यों को जितने के बाद खारवेल  वहां से प्रथम जैन तीर्थकंर की मूर्ति को वापस "कलिंग" ले आया था, जिसे पूर्व में कलिंग से बलपूर्वक ले जाया गया था। 

  • खारवेल को इतिहास ने विजेता शासक के रूपमें सम्मानीय स्थान प्राप्त होता है।