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जैन धर्म (Jainism)

  • 6ठी शताब्दी ईसा पूर्व में ब्राह्मणों के बढ़ते जटिल कर्मकाण्डों की प्रक्रिया के खिलाफ "जैन धर्म" का उदय हुआ था। 

  • जैन धर्म के संस्थापक "ऋषभदेव" थे। 

  • "ऋषभदेव" जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर एवं प्रवर्तक थे। 

  • जैन धर्म में 24 तीर्थंकर एवं प्रवर्तक थे। 

  • तीर्थंकर का शाब्दिक अर्थ "पथ - प्रदर्शक" होता है। 

  • 23 वें तीर्थंकर "पार्श्वनाथ" काशी के इच्छवाकु वंशीय राजा अश्वसेन के पुत्र थे। 

  • 30 वर्ष की अवस्था में ये सन्यासी बने। 

  • "सम्मेत पर्वत" (पारसनाथ) पर साधना करते 100 वर्ष की अवस्था में पार्श्वनाथ मृत्यु को प्राप्त हुए। 

  • "पार्श्वनाथ" ने भिक्षुओं को श्वेत (सफ़ेद) वस्त्र पहनने को कहा। 

  • "पार्शवनाथ" का प्रतीक चिन्ह "साँप" था। 

 

पार्शवनाथ की शिक्षाएँ निम्नवत हैं:- 

  1. सदा सत्य बोलना। 

  2. चोरी न करना। 

  3. हिंसा न करना। 

  4. सम्पत्ति - संग्रह न करना। 

  5. आत्मसंयम बनाये रखना। 

 

जैन धर्म के शीलव्रत निम्नवत है :- 

  1. देशव्रत 

  2. दिग्व्रत 

  3. आतिथी संविभाग 

  4. उपभोग - प्रतिभोग 

  5. प्रोषधोपवास 

  6. अनर्थ दंडव्रत 

  7. सामरिक व्रत 

 

जैन धर्म की पाँच श्रेणियाँ निम्नवत हैं:- 

  1. तीर्थंकर - वह जिसने मोक्ष की प्राप्ति की हो। 

  2. अर्हत - वह जो निर्वाण की प्राप्ति की ओर अग्रसर हो। 

  3. आचार्य -  जैन - भिक्षुओं के समूह का प्रमुख। 

  4. उपाध्याय - जैन धर्म का शिक्षक। 

  5. साधू - सारे जैन भिक्षु 

जैन धर्म के पंचमहाव्रत निम्नवत हैं:- 

  1. अहिंसा - जान - बूझकर या अनजाने में भी किसी प्रकार की हिंसा नहीं करना। 

  2. सत्य - सदा सत्य बोलना। 

  3. अस्तेय - किसी व्यक्ति की कोई वस्तु बिना उसकी इच्छा  नहीं करना न ऐसी कोई इच्छा करना। 

  4. अपरिग्रह - किसी प्रकार का संग्रह नहीं करना। 

  5. ब्रह्मचर्य - ब्रह्मचर्य व्रत का सख्ती से पालन करना। 

जैन संगीतियाँ 

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