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रक्त परिवहन तंत्र (Blood Circulatory System)

  • मनुषों में द्विगुण रक्त परिवहन होता  है, जिसकी जानकारी सबसे पहले विलियम हार्वे ने बताया था। 

  • रक्त परिवाहन में हृदय, धमनी और शिरा भाग लेते हैं। 

  • हृदय दोनों फेफड़ों के बीच हृदय गुहा (Pericardial Cavity) में स्थित होता है तथा हृदयावरण (Pericardium) नामक पतली झिल्ली से ढंका रहता है। 

  • हृदय का अकार त्रिभुजाकार होता है, जो ऊपर की ओर चौड़ा और निचे की ओर पतला होता है। 

  • इसका वजन 300 gm होता है, लम्बाई 12 cm और चौड़ाई 9 cm होता है। 

  • ह्रदय  चार कोष्ठों का बना होता है, ऊपर दांयाँ एवं बांयाँ आलिंद (Auricle) एवं नीचे दांयाँ एवं बांयाँ निलय (Ventricle) होता है। 

  • दाएं आलिंद में अशुद्ध रक्त और बाएं आलिंद में शुद्ध रक्त बहता है। 

  • दाएं आलिंद और दाएं निलय के बीच त्रिदलीय कपाट (Tricuspid Valve) एवं बाएं आलिंद और बाएं निलय के बीच द्विदलीय कपाट (Bicuspid Valve) पाया जाता है। 

  • महाशिराओं के छिद्रों के पास दाएं आलिंद में तंत्रिकीय पेशीय ऊतक से बना एक संकुचन केंद्र होता है, जिसे Sinu Auricular Node या S.A.Node कहते हैं। 

  • दूसरी संकुचन केंद्र अंतर आलिंद पट के निचले सिरे के पास बाएं आलिंद की दिवार में स्थित होता है, जिसे Auriculo - Ventricular Node या A.V.Node कहते हैं। 

  • हृदय का संकुचन S.A.Node  से शुरू होता है, अतः इसे पेसमेकर भी कहते हैं। 

  • शरीर के विभिन्न भागों में रक्त की हृदय के दाएं भाग में लाने वाली नली को शिरा (Vein) कहते हैं। 

  • शिरा में हमेशा अशुद्ध रक्त बहता है, परन्तु फुफ्फुसीय शिरा (Pulmonary Veins) में फेफड़े में बाएं आलिंद तक शुद्ध रक्त बहता है। 

  • हृदय से शरीर के विभिन्न भागों तक शुद्ध रक्त को ले जाने वाली नली को धमनी (Artery) कहलाती है। 

  • धमनी में हमेशा शुद्ध रक्त रहता है, परन्तु फुफ्फुसीय शिरा (Pulmonary Veins) दाएं निलय से फेफड़े तक अशुद्ध रक्त बहता है। 

  • ह्रदय से पेशियों तक रक्त पहुँचाने वाली वाहिनी को कोरोनरी धमनी कहते हैं, इसी में किसी प्रकार की रूकावट होने पर हृदयघात (Heart Attack) होता है। 

  • रक्त का परिसंचरण हृदय के संकुचन और फैलाव के द्वारा नियंत्रित होता है। 

  • मनुष्य के आलिंद के सिस्टोल में  0.15 सेकेण्ड, निलय के सिस्टोल में 0.30 सेकेण्ड और डायस्टोल में  0.40 सेकेण्ड का समय है।  इस प्रकार पूर्ण ह्रदय धड़कन (Heart Beat) में 0.85 सेकेण्ड का समय लगता है। 

  • सामान्य अवस्था में  व्यस्क का हृदय प्रतिमिनट में 70 - 72 बार धड़कता है तथा प्रति धड़कन में 70 ml रक्त पम्प करता है। 

  • हृदय की धड़कन हाथी में 25 बार, चूहे में 400 बार, मनुष्य के नवजात शिशु में 120 बार, बूढ़े व्यक्ति में 60 बार  होती है। 

  • मनुष्य में निलय के संकुचन के समय प्रत्येक निलय से 60 - 80 cc रक्त झटके से धमनी में प्रवाहित होता है। 

  • संकुचन के समय धमनी की दिवार पर अधिक दवाब रहता है तथा अनुशिथलन के समय रक्त का दवाब कम  रहता है। 

  • इस तरह धमनी की दिवार पर सिस्टोलिक प्रेशर डायस्टोलिक प्रेशर के कारण धमनी का फैलाव और संकुचन होता है।  

  • रक्त दाब की माप स्फिग्नोमैनोमीटर द्वारा होती है। 

  • एक व्यस्क मनुष्य के धमनी का रक्त दाब होता है - 120 mm Hg (Systolic Pressure) / 80 mm Hg (Diastolic Pressure)

  • थाइरॉक्सिन एवं एड्रेनेलिन स्वतंत्र रूप से हृदय की धड़कन को नियंत्रित करने वाले हार्मोन हैं। 

  • रक्त में उपस्थित कार्बन डाइऑक्सइड रक्त के pH को कम करके हृदय की गति को बढ़ाता है। अर्थात अम्लीयता हृदय की गति को बढ़ाता है एवं क्षारीयता हृदय गति को कम करता है। 

लसिका परिसंचरण तंत्र 

  • विभिन्न ऊतकों तथा कोशिकाओं के बीच स्थित अनराकोशिकीय स्थानों में उपस्थित रंगहीन द्रव लसिका कहलता है।

  • लसिका रक्त प्लाज़्मा का अंश है जिसमें पौष्टिक पदार्थ ऑक्सीजन तथा कई अन्य पदार्थ पाए जाते हैं। 

  • लसिका में पाए जाने वाली कणिकाएं लिम्फोसाइट कहलाती हैं, जो वास्तव में श्वेत रक्त कणिकाएं ही है।

  • लसिका का प्रवाह केवल ऊतकों से ह्रदय की ओर एक दिशा में होता है। 

  • लसिका का लिफोसाइट हानिकारक जीवाणुओं का भक्षण  करता है। 

  • लसिका नोड मनुष्य शरीर में छन्ने जैसा कार्य करती है। धूलकण, जीवाणु, कैंसर कोशिकाएं इत्यादि लिम्फनोड में फंस जाती हैं। 

  • लसिका घावों को भरने एवं ऊतकों से शिराओं में विभिन्न वस्तुओं को परिसंचरण में सहायक होती है।