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लवक (Plastid)

  • यह केवल पादप कोशिका  पादप में पायी जाती है। 

  • यह तीन प्रकार का होता है :-  हरित लवक, वर्णिलवक और अवर्णिलवक  

 

हरितलवक (Chloroplast)

  • इसके भीतर पर्णहरित (Chlorophyll) नामक पदार्थ पाया जाता है।

  • जिसके कारण इसका रंग हरा होता है। 

  • पर्णहरित के केन्द्रक में मैग्नीशियम धातु पाया जाता है। 

  • इसके भीतर उलटी तश्तरियों जैसी संरचना पायी जाती है जिसे थाईलाक्वाएड कहा जाता है, तथा इसके समूह को ग्रेनम कहते हैं। 

  • कोशिका में हरितलवक की संख्या 1 - 80 तक होती है। 

  • यह प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में सहायता करता है।  अतः इसे कोशिका की रसोई कहा जाता है। 

  • हरितलवक में क्लोरोफिल के अलावा कैरोटीन तथा जैंथोफिल नामक पदार्थ भी पाया जाता है। 

वर्णी लवक (Chromoplast)

  • हरे रंग को छोड़कर अन्य रंगों से युक्त लवकों को वर्णी लवक कहते हैं। 

  • यह पुष्प, फलभित्ति, बीज इत्यादि भागों में पाया जाता है। 

  • उदाहरण:- टमाटर में लाइकोपेन, गाजर में कैरोटीन और चुकंदर में बिटामीन (Betamin) इत्यादि

अवर्णीलवक (Leucoplasts)

  • यह रंगीन होता है जो साधारणतः जड़ों में पाया जाता है। 

  • यह भोज्य पदार्थों का संग्रह करता है। 

रसधानी (Vacuoles)

  • यह कोशिका की निर्जीव रचना है। 

  • यह पादप कोशिका में अधिक विकसित होता है, परन्तु जंतु कोशिका में छोटी होती है। 

 

स्फेरोसोम्स (Spherosomes)

  • यह सक्रिय मेटाबोली (उपापचयी) पादप कोशिकाओं में पाया जाता है। 

  • इसमें वसा की मात्रा अधिक होती है। 

  • ये तैलीय भ्रूणपोषी बीजों एवं फ्लोएम ऊतक की चलनी नलिकाओं में अधिक पायी जाती है। 

 

केन्द्रिका (Nucleus)

  • यह कोशिका का सबसे महत्वपूर्ण भाग है जो समस्त कोशिका नियंत्रक कहलाता है। 

  • इसकी खोज सर्वप्रथम रोबर्ट ब्राउन (Robert Brown) ने 1831 में की थी। 

  • केन्द्रक के अध्ययन को कैरियोलॉजी (Karyology) कहा जाता है। 

  • एक केन्द्रक वाले कोशिका  एककेंद्रकीय तथा एक  केन्द्रक वाले कोशिका को बहुकेन्द्रकीय कहते हैं। 

  • स्तनधारियों का लाल रक्त कण (R.B.C.) एकमात्र ऐसी कोशिका है जिसमें केन्द्रक नहीं पाया जाता है। 

 

केन्द्रक चार भागों में बंटा रहता है :- 

  • केन्द्रक झिल्ली (Nuclear Membrane)

  • केन्द्रिका (Nucleus)

  • केन्द्रक द्रव्य (Nucleoplasm or Karyolymph)

  • क्रोमैटिन जाल (Chromatin Network)

 

  • क्रोमैटिन जाल कोशिका विभाजन के समय लम्बे एवं पतले सूत्र के रूप में स्पष्ट हो जाता है जिसे गुणसूत्र (Chromosome) कहते हैं। 

  • गुणसूत्र शब्द का  सर्वप्रथम प्रयोग 1888 में वॉल्डेयर (Waldeyer) ने किया था। 

  • प्रत्येक गुणसूत्र का उपयोग जीन (Gene) पाए जाते हैं जो आनुवांशिक गुणों को एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी में ले जाने का कार्य करती है। 

  • गुणसूत्र का निर्माण हिस्टोन, प्रोटीन एवं D.N.A. के द्वारा होता है। 

  • गुणसूत्र की रचना का अध्ययन स्पष्ट रूप से कोशिका विभाजन के मेटाफेज अवस्था के दौरान किया जाता है। 

  • गुणसूत्र के भीतर जेली जैसा गाढ़ा पदार्थ भरा रहता है जिसे मैट्रिक्स कहते हैं। 

  • मैट्रिक्स में महीन एवं कुंडलित सूत्र दिखाई देता है जिसे क्रोमोनीमटा कहते हैं। 

  • क्रोमोनीमटा लगभग 8 सूक्ष्म तंतुओं का बना होता है। 

  • गुणसूत्र मध्य सेंट्रोमीयर नामक रचना पायी जाती है जो इसे दो बाहों (arms) में बांटता है। 

  • प्रत्येक जीवों के गुणसूत्रों की निश्चित संख्या होती है, जिनमें से कुछ महत्वपूर्ण का विवरण निम्नवत है :-