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मनुष्य रक्त समूह (Blood Group)

  • रक्त समूह की खोज सर्वप्रथम लैण्ड स्टीनर ने किया था। 

  • रक्त समूह की खोज के लिए लाइन स्टीनर को 1930 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 

  • मनुष्यों रक्त में भिन्नता का मुख्य कारण R.B.C. में पायी जाने वाली ग्लाइको प्रोटीन है, जिसे एण्टीजन (Antibody) कहते हैं। 

  • एण्टीजन (Antibody) दो प्रकार के होते हैं : A एवं B 

  • किसी एण्टीजन की अनुपस्थिति में एक विपरीत प्रकार का प्रोटीन रक्त पाया जाता है जिसे ऐंटीबॉडी (Antibody) कहते हैं। 

  • ऐंटीबॉडी (Antibody) भी दो प्रकार के होते हैं : a एवं b 

  • अतः एन्टीजन एवं ऐंटीबॉडी के आधार पर रक्त को निम्नलिखित चार समूहों में पाया जाता है। 

  • एन्टीजन A एवं ऐंटीबॉडी a, एन्टीजन B एवं ऐंटीबॉडी b के साथ नहीं रह सकते हैं, क्यूंकि ऐसा होएं पर ये आपस में चिपक जाते हैं। 

  • रक्त ग्रुप "O" को सार्विक दाता (Universal Donor) कहते हैं, क्युकि इनमें एन्टीजन नहीं होता है। 

  • रक्त ग्रुप "AB" को सर्वग्राह्यता (Universal receptor) कहते हैं, क्यूंकि इसमें कोई ऐंटीबॉडी नहीं होता है। 

  • Rh-factor : 1940 में लैण्डस्टीनर एवं व्हीनर ने रक्त में एक अन्य प्रकार के एन्टीजन का पता लगाया। 

  • इसका पता इन्होने रीसस मकाका नामक बंदर के रक्त में लगाया था। 

  • अतः इसे Rh-factor कहते हैं। 

  • जिन व्यक्तियों के रक्त में Rh उपस्थित होता है, उनके रक्त ग्रुप को Positive तथा जिनमें अनुपस्थित होता है उन्हें Negative कहते हैं। 

  • रक्त के लेन देन में Rh-factor की भी जांच की आवश्यक होती है। क्यूंकि Rh (+) रक्त वर्ग के खून को Rh (-) वाले को नहीं दिया जा सकता, ऐसा करने से व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है। 

  • विश्व में लगभग 14% व्यक्तियों रक्त ही Rh (-) ग्रुप वाला होता है। 

  • यदि पिता का रक्त Rh (+) का और माता का Rh (-) हो तो जन्म लेने वाले शिशु की मौत गर्भावस्था में ही अथवा जन्म के तुरंत बाद ही हो जाती है, इस स्थिति को "इरिथ्रो ब्लास्टोसिस्फिटेलिस" कहते हैं। 

  • नोट :- डेंगू ज्वर के कारण मानव शरीर में प्लेटलेट्स की कमी हो जाती है। 

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