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ताम्र - पाषाण काल (Calcolithic age)

  • नवपाषाण काल के बाद मनुष्यों ने ताँबे की खोज कर ली थी। 

  • मनुष्य अब अपने औजार पत्थर और ताम्बे को मिलाकर बनाता था। 

  • इस काल को इसी कारण "ताम्र - पाषाण काल (Calcolithic age)" नाम दिया गया। 

  • ताम्र - पाषाण काल या कैल्कोलिथिक युग का काल सामान्यतया 1800 ई० पू० माना जाता है। 

  • धातुओं में सर्वप्रथम मानव ने "ताँबे" का प्रयोग किया था। 

  • भारत में ताम्र - पाषाण युग के साक्ष्य निम्न क्षेत्रों से  प्राप्त होते हैं :- 

  1. पश्चिमी मध्यप्रदेश - नवदाटोली, एरण, मालवा, कायथा आदि। 

  2. दक्षिण - पूर्वी भारत। 

  3. पश्चिमी महाराष्ट्र - चंदोली, नासिक और प्रकाश (पुणे), इनामगांव, सोनगांव, जोर्वे, दैमाबाद, निवास (तीनों अहमदनगर में)

  4. दक्षिण पूर्वी राजस्थान - गिलूंद एवं अहार 

 

  • अहार का प्राचीन नाम "ताम्बवती" अर्थात - ताँबे का स्थान था। 

  • गिलूंद, अहार संस्कृति का प्रधान केंद्र माना जाता है। 

  • बिहार के सारण जिले के "चिरांद" नामक स्थान से नवपाषाण काल की संस्कृति के साथ - साथ ताम्रपाषाणकालीन संस्कृतीत के अवशेष मिले हैं। 

  • मैसूर के निकट स्थित ब्रह्मगिरि और नर्मदा नदी के तट पर स्थित नवाद टोली से ताँबे एवं काँसे की कुल्हाड़ियाँ प्राप्त हुई हैं। 

  • अहार और गिलूंद दोनों बड़ी बस्तियां थीं। 

  • अहार का टीला 1500 x  800 फुट और गिलूंद का टीला 1500 x  750 फुट बड़ा है। 

  • निर्माण कार्य, तंदूर और चावल एवं बाजरे की खेती के साक्ष्य अहार से मिले हैं। 

  • दक्षिण पूर्वी राजस्थान की संस्कृति "अहार संस्कृति" कहलाती थी। 

  • अहार, बालाथल और गिलूंद "अहार संस्कृति"  प्रमुख बस्तियां थीं। 

  • बनास नदी घाटी के नाम से इसे "बनास संस्कृति" भी कहते हैं। 

  • अहार से ताँबे की वस्तुओं में अंगूठियां, चूड़ियां, चाक़ू के फाल, सुरमे की सलाइयां और कुल्हाड़ियाँ प्राप्त हुई हैं। 

  • "बालाथल" परकोटे से घिरी हुई बस्ती थी। 

  • ताम्रपाषाणिक काल में ही चित्रित भांडों के अवशेष मिलते हैं। 

  • ताम्रपाषण काल के लोग मातृदेवी की पूजा करते थे। 

  • ताम्रपाषण काल से "अग्निकुण्ड" भी मिले हैं। 

  • मालवा संस्कृति के प्रमुख स्थल हैं - एरण, नागदा और नवाद टोली 

  • मालवा संस्कृति के मृदभांड उच्च कोटि के होते थे। 

  • नागदा से कच्ची ईंटों का बना हुआ बुर्ज मिला है जिसके चारों ओर एक खाई के साथ परकोटा भी निर्मित है। 

  • नवाद टोली का उत्खनन कार्य "प्रो० एच० डी० सनकालिया" ने करवाया था। 

  • नवाद टोली में दो किस्म के गेहूँ, काला चना, मसूर, अलसी, खेसारी, हरी मटर, हरा चना के उपजाने के साक्ष्य मिले हैं। 

  • अहार से भेड़, हिरन, सूअर, गाय, कछुए, भैंस, मुर्गे, बकरी, मछली की अस्थियां मिली हैं। 

  • इनामगांव, दैमाबाद, प्रकाश जोर्वे - संस्कृति के मुख्य स्थल है। 

  • संख्या की दृष्टि से जोर्वे की बस्तियाँ अधिक मिली हैं। 

  • इनामगांव जैसे स्थलों पर जोर्वे - संस्कृति 700 ई० पु० तक विधमान रही थी। 

  • जोर्वे संस्कृति की प्रमुख विशेषता "टोंटीदार बरतन" थे। 

  • महारष्ट्र के उत्खनित स्थलों में से दैमाबाद काफी महत्वपूर्ण है। 

  • जोर्वे संस्कृति का मुख्य व्यवसाय खेती और पशुपालन था। 

  • जोर्वे संस्कृति के लोग शिकार करते थे और मछली भी पकड़ते थे। 

  • जोर्वे संस्कृति में वस्तु विनिमय के द्वारा लोग व्यापार करते थे। 

  • जोर्वे संस्कृति के लोग सोने के बने आभूषणों का भी प्रयोग करते थे। 

  • निवास से पटसन का साक्ष्य प्राप्त हुआ है। 

  • दैमाबाद से ताँबे की प्राप्त प्रमुख वस्तुएं हैं - सांड, हाथी, गैंडा और रथ चलाता मनुष्य 

  • जोर्वे संस्कृति के लोग लाल व् काले मृदभांडों का प्रयोग करते थे। 

  • जोर्वे संस्कृति का अंत भीषण सूखा पड़ने से हुआ था।